भारत की जलवायु मिशन में इस वर्ष की मानसौनी पावन शरद ऋतु ने एक नया मोड़ ले लिया है। पिछले कई हफ्तों में लगातार भारी वर्षा ने देश के विभिन्न भागों में बार-बार बाढ़ की चेतावनी को पीछे छोड़ कर बरसात के अभाव को घटा दिया। मौसम विभाग के आंकड़े दर्शाते हैं कि मानसून के कारण कुल वर्षा का घाटा, जो पहले 45 प्रतिशत था, अब घटकर 28 प्रतिशत रह गया है। यह गिरावट किसानों और जलस्रोत प्रबंधकों के लिए आशा का संचार करती है, क्योंकि अतीत में समुद्र स्तर के नीचे जलभंडारण की कमी से कई क्षेत्रों में सूखे की गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही थी। केंद्रीय जलवायु परिवर्तन एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष के मानसून ने लगभग 150 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि को पर्याप्त नमी प्रदान की है। विशेष रूप से उत्तर भारत के बारताल, मध्य प्रदेश के धाबेला, और पूर्वी भारत के झारखंड तथा उड़ीसा में तेज़ बारिश ने जलभराव को कम किया और नदियों के जलस्तर को पुनर्स्थापित किया। इस वर्ष की बारिश ने राष्ट्रीय जलभंडारण योजना के तहत निर्मित बाँधों में जलस्तर को सामान्य सीमा तक ले आया, जिससे वर्षा जल संचयन परियोजनाओं को भी लाभ मिला। फिर भी, यह राहत पूर्ण रूप से स्थायी नहीं माना जा सकता। कई किसान अभी भी अपने खेतों में जल की कमी को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि बारिश का वितरण असमान रहा है। दुबई, राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में फिर भी जलसंकट बना हुआ है, जहाँ कई तालाब सूखे पड़े हैं और जलकुंभियों को वैकल्पिक जल स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त, तेज़ और अचानक होने वाली बौछारों से जल निकायों में अत्यधिक पानी का उत्सर्जन हो रहा है, जिससे बाढ़ की आशंका भी बनी हुई है। सरकार ने इस स्थिति को देखते हुए किसानों को अतिरिक्त सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव रखा है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने सूखे प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई के लिए अतिरिक्त जलसंरक्षण उपायों को लागू किया है और जलसंकट से जूझ रहे किसानों को वित्तीय सहायता के नए पैकेज की घोषणा की है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए वर्षा जल संरक्षण, जल पुनर्चक्रण और जलवायु-सहज खेती के प्रोत्साहन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। निष्कर्षतः, इस वर्ष का मानसून भारत के जलसंकट को कुछ हद तक कम करने में सफल रहा है, परन्तु सतत जलप्रबंधन और जलवायु अनुकूलन के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। भारी बारिश ने बारिश के घाटे को 45 प्रतिशत से घटाकर 28 प्रतिशत कर दिया, जो एक सकारात्मक संकेत है, परन्तु असमान वितरण और स्थानीय जलसंकट को देखते हुए दीर्घकालिक समाधान के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश और प्रभावी नीतियों की जरूरत है।