जंतर मंदिर में लगातार चल रहा विरोध गति पकड़ता ही जा रहा है। हलचल की नौबत में, इस धरने पर मौजूद युवा कार्यकर्ता, छात्र, और विभिन्न सामाजिक समूह एक साथ मिलकर "कॉकरोचों" की उपमा में अपनी संघर्ष की कहानियों को बुन रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल राजनीतिक बयान देना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय मंच पर अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना है। इस धरने की शुरुआत में कई युवा ने उपभोग वाली वस्तुओं को जंगली "कॉकरोच" के रूप में देख कर, उन्हें अपने दर्शकों तक पहुँचाने के लिए विभिन्न रचनात्मक उपाय अपनाए। वहीँ वही जज्बा उन्हें स्वच्छता, स्वास्थ्य और साक्षरता जैसे मुद्दों पर भी आगे बढ़ा रहा है। दहलेस के सातवें दिन, सॉन्म वांगचुक ने उपवास जारी रखा और उन्होंने अपनी स्वास्थ्य स्थिति का खुलासा भी किया। उन्होंने बताया कि इस उपवास के कारण उनका वजन पाँच किलोग्राम गिर गया है, रक्तचाप और रक्त शुगर का स्तर घट रहा है। लेकिन इस गिरावट के साथ ही उनका शरीर थकान और कमजोरियों से ग्रस्त हो रहा है। इस बीच, उनकी टीम ने एक विशेष संगीत प्लेलिस्ट तैयार करके धरने के माहौल को तनावमुक्त करने की कोशिश की। इस प्लेलिस्ट में पुरानी वायर वाले इयरफोन लेकर वे संगीत सुनते रहे, जिससे न केवल मनोबल बढ़ा बल्कि अन्य उपस्थित लोगों को भी ऊर्जा मिली। विरोधी समूह ने अपने हक़ को बचाने के लिये विभिन्न मंचों पर निरंतर अपील की। डिपके ने राष्ट्र स्तर पर एक दिन की एकता व्रत रखने का आह्वान किया, जिससे देश भर में एकजुटता की भावना को जगाया जा सके। वहीं दुष्ट पॉलिसी के विरुद्ध बहस को और भी गहरा करने के लिये, जत्रि में शोषण के विरुद्ध कई वाक्यांशों को उभारा गया। उन्होंने खुद को "कमजोर और थके हुए" कहा, परन्तु यह भी कहा गया कि एकजुटता में शक्ति है और यह ही उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। जंतर मंदिर के इस स्थल पर आज की स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि संघर्ष के दौरान भी लोग रचनात्मकता और अनुशासन को नहीं भूलते। आठवें दिन तक, उपवासकर्ता ने अपने शरीर की क्षमताओं को जाँचते हुए बताया कि अब उनकी सहनशीलता कितनी बढ़ी है और वह इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में दृढ़ संकल्पित हैं। इस दिशा में कई सामाजिक संगठनों ने भी अपना समर्थन दिया और साथ ही स्वास्थ्य टीमों ने नियमित जांच कर आगे की देखभाल का आश्वासन दिया। अंत में यह कहा जा सकता है कि जंतर मंदिर में चल रहा यह धरना सिर्फ एक छोटी सी आवाज़ नहीं है, बल्कि यह एक विशाल आंदोलन बन चुका है, जिसमें हर "कॉकरोच" जैसे छोटे-छोटे कामगार भी अपना योगदान दे रहे हैं। असली बात यह है कि इन छोटे-छोटे प्रयासों से ही सामाजिक बदलाव की नींव मजबूत होती है। इसलिए, जनता को चाहिए कि वह इस संघर्ष को समझे, समर्थन करे और मिलकर इस आंदोलन को सफलता की ओर ले जाये।