जुलाई के शुरू होने से पहले ही भारत में मौसम विभाग ने एक स्पष्ट चेतावनी जारी की है कि इस वर्ष का मौसम सामान्य से कम रहेगा। पिछले महीने, यानी जून में अत्यधिक सूखा देखा गया, जिससे वर्षा में 40 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इस कमी के कारण कृषि क्षेत्र विशेष रूप से जलवायु-संवेदनशील फसलों की फसल उत्पादन पर गंभीर असर पड़ने की संभावना है। मौसम विज्ञानविदों ने बताया कि एटलांटिक में चल रहे एल नीनो प्रभाव और अन्य वैश्विक जलवायु पैटर्न के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में वर्षा का वितरण असमान रहेगा, जिससे कई राज्यों में जल अभाव की स्थिति बन सकती है। वायुमंडलीय स्थितियों के विश्लेषण के बाद, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने कहा कि जुलाई की औसत वर्षा अब सामान्य स्तर से नीचे रहने की संभावना है। विशेषकर मध्य और पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में वर्षा का स्तर 20 से 30 प्रतिशत तक गिर सकता है। ऐसी स्थिति में कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सुझाव दिया है कि वो जल-संरक्षण तकनीकों, जैसे कि सूक्ष्म सिंचाई, जलाशय निर्माण और बीज चयन में बदलाव को अपनाएँ। इसके अलावा, केंद्र ने 12 सूखे-प्रभावित राज्यों के लिए आपातकालीन योजना तैयार कर रखी है, जिसमें सिंचाई के लिए रेफ्रिजरेशन टैंक, रोपण सहायता और बीमा योजना शामिल हैं। जुड़ी हुई रिपोर्टों के अनुसार, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे कृषि प्रमुख राज्यों में किसानों ने अपने खेतों में बीज बोने की गति को धीमा कर दिया है। गुजरात में विशेष रूप से खड़ी-फसली की बुवाई में 82 प्रतिशत वर्षा कमी के कारण आमदनी में गिरावट का खतरा है। किसान संघों ने सरकार से तत्काल सहायता की माँग की है, जिससे कि वे पानी की कमी को पूरा कर सकें और फसल की पैदावार को बचा सकें। इस बीच, कृषि मंत्रालय ने किसानों को सूखा राहत पैकेज प्रदान करने की घोषणा की है, जिसमें रसेद जलावन, फसल बीमा प्रीमियम में छूट और न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी शामिल है। समग्र तौर पर, इस बार का जून महीना भारत के जल चक्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ है। यदि जुलाई में भी वर्षा में कमी बनी रही, तो आगामी रबी और खड़ी-फसली दोनों मौसमों में दर्शनीय गिरावट देखी जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति को सुधारने के लिए दीर्घकालिक उपायों की जरूरत है, जैसे कि जलभरणीय संसाधनों का सुदृढ़ीकरण, जलदोष नियंत्रण और सतत कृषि प्रथाओं को अपनाना। सरकार और विभिन्न प्रादेशिक एजेंसियों को मिलकर एक संयुक्त योजना बनानी चाहिए, जिससे कि किसानों को सुरक्षित जल उपलब्धता और मौसम के प्रति बेहतर तैयारी मिल सके।