केतन अग्रवाल की रहस्यमयी मृत्यु के बाद भारतीय न्याय व्यवस्था ने एक नया वैज्ञानिक उपाय अपनाया है—गैट एनालिसिस। यह परीक्षण, जो आम तौर पर फुट इम्प्रिंट या रक्त नमूने की तुलना में कम ज्ञात है, अपराधसिद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। केस की शुरुआती जाँच में सीतन, जिसका शारीरिक संबंध शिया गोयाल से माना जाता है, पर कई प्रश्न उठे। पुलिस ने यह निर्णय लिया कि मार्ग विश्लेषण द्वारा सीतन के चलने के पैटर्न का अध्ययन करके यह तय किया जाए कि वह मृत्यु स्थल पर मौजूद था या नहीं। इस लेख में हम गैट एनालिसिस क्या है, कैसे किया जाता है, और सीतन के खिलाफ संभावित परीक्षण के चरणों को विस्तार से समझेंगे। गैट एनालिसिस, जिसका अर्थ है चलने की शैली का वैज्ञानिक विश्लेषण, मुख्यतः दो पहलुओं पर केंद्रित होता है—पैरों के कदम की दूरी, गति, तथा पृथक्करण का विविधता। पादत्राणे या विशेष कैमरों के माध्यम से एकत्रित डेटा को कम्प्यूटरीकृत मॉडल में डाला जाता है, जिससे चलने की अनूठी “हस्ताक्षर” तैयार होती है। यह विधि अपराध स्थल पर पाए गए फुटप्रिंट या डाइ हॉलिक पाउडर के निशानों के साथ तुलना करती है, जिससे यह पुष्टि की जा सकती है कि कोई व्यक्ति वास्तव में उस स्थल पर मौजूद था या नहीं। केस की जटिलता को देखते हुए, इस तकनीक को लागू करने के लिए विशेषज्ञ फॉरेंसिक विज्ञान संस्थान को नियुक्त किया गया है, जो सीतन के शारीरिक कार्यों को सटीक रूप से मॉडल करेंगे। सीतन के संभावित परीक्षण में सबसे पहले उसके चलने के पैटर्न को रिकॉर्ड करने हेतु एक नियंत्रित प्रयोगशाला सेटअप तैयार किया जाएगा। इसमें सीतन को विभिन्न सतहों—जैसे टाइल, कालीन और कंक्रीट—पर चलाया जाएगा, जबकि उसकी गति, कदम की लंबाई और पैर के संपर्क समय को सेंसर द्वारा मापा जाएगा। फिर इन डेटा को विशेष सॉफ्टवेयर में डाल कर उसकी चलने की प्रोफ़ाइल तैयार की जाएगी। इसके बाद, लोहगड़ (लोहा) में प्राप्त जाँच परिणामों—जैसे केस स्थल पर मिले पैर के निशान—की तुलना इस प्रोफ़ाइल से की जाएगी। यदि दोनों में उच्च स्तर की समानता पाई जाती है, तो यह अदालत को एक मजबूत वैज्ञानिक सबूत प्रदान करेगा, जो सीतन के रिलेशन को सुधारने में मददगार सिद्ध हो सकता है। अंत में कहा जा सकता है कि गैट एनालिसिस का परिचय केस को नई दिशा देता है और परंपरागत जाँच विधियों में सुधार लाता है। यह तकनीक न केवल सीतन के खिलाफ संभावित आरोपों को सिद्ध कर सकती है, बल्कि भविष्य में अन्य ऐसे जटिल मामलों में भी सच्चाई तक पहुँचने का एक विश्वसनीय माध्यम बन सकती है। न्याय प्रक्रिया में वैज्ञानिक साक्ष्य का यह मिश्रण, जनता के विश्वास को पुनर्स्थापित करने तथा पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने में निर्णायक साबित होगा।