धार्मिक और मानवीय संकट के बीच भारत सरकार की मौनता ने देश के राजनीति के प्रमुख नेता सोनिया गांधी को गुस्सा दिला दिया है। हाल ही में गाज़ा में बढ़ते तनाव और निरंतर निहत्थी हिंसा को देखते हुए, भारत की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका पर सवाल उठाने वाले इस बयान में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मोदी सरकार की 'पत्थर जैसी चुप्पी' की निंदा की। सोनिया गांधी ने कहा कि गाज़ा में हो रहे नरसंहार को लेकर भारत की चुप्पी न केवल मानवीय मूल्यों के विरुद्ध है, बल्कि हमारे विदेशी नीति के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ़ है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की नीतियों से भारत का अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है। सोनिया ने यह बात कई मंचों पर दोहराई, जिसमें उन्होंने अपने विरोधियों को यह याद दिलाया कि भारत ने कभी भी विश्व मामलों में अनदेखा नहीं किया और न ही अपने नैतिक सिद्धांतों पर कभी समझौता किया। उन्होंने सवाल उठाया कि भारत, जो जरूरतमंद लोगों के लिए हमेशा आवाज़ रहा है, अब किस तरह प्रतिबंधित कारणों से इस अंतर्राष्ट्रीय मानवीय संकट को अनदेखा कर रहा है? कांग्रेस के इस प्रमुख नेता ने यह भी संकेत दिया कि इस चुप्पी के पीछे राजनीतिक गणना और विदेश नीति में स्वतंत्रता की कमी हो सकती है। उन्होंने कहा, "भारत की विदेशी नीति को फिर से स्वतंत्र रूप से स्थापित करने की ज़रूरत है, न कि किसी राजनीतिक दल या सरकार की स्वार्थी रणनीति के अधीन।" इस टिप्पणी के पश्चात राष्ट्रीय स्तर पर तीखी चर्चाएँ छिड़ गईं। कई विपक्षी नेताओं ने सोनिया की बातों का समर्थन करते हुए कहा कि गाज़ा में इंसानों की मृत्यु एक नरसंहार है और इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। वहीं कुछ टिप्पणीकारों ने कहा कि भारत की विदेश नीति हमेशा संतुलित रही है और इसे किसी भी संघर्ष में सीधे हस्तक्षेप से बचना चाहिए। लेकिन यह स्पष्ट है कि सोनिया का यह आक्रमण सरकार के भीतर नीतियों की पुनः समीक्षा का एक और संकेत है, जिसमें मानवीय सहायता और अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों का पालन प्रमुख है। भविष्य की ओर देखते हुए, सोनिया गांधी ने भारतीय जनता से आह्वान किया कि वह सरकार को इस मुद्दे पर स्पष्ट बयान देने के लिए दबाव बनाए। उन्होंने कहा, "हमें एक स्वतंत्र और साहसी विदेश नीति चाहिए, जिसमें नैतिक स्पष्टता हो और जहाँ हम विश्व को सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि कार्यों से भी प्रभावित कर सकें।" अंततः यह बहस यह तय करेगी कि भारत अपने मूल सिद्धांतों को पुनः प्राप्त करेगा या फिर मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में अपनी स्थिति को और अधिक ठोस करेगा।