नई दिल्ली के राजनीतिक मंच पर हाल ही में एक तीखा झटका लगा है। कांग्रेस की प्रमुख नेता सोनिया गांधी ने मोड़ी सरकार की गाज़ा संकट के प्रति "शून्य" प्रतिक्रिया को निन्दा करते हुए कहा कि "भारत की इस मौन को कोई भी तर्कसंगत या नैतिक रूप से समझा नहीं सकता"। यह टिप्पणी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गाज़ा में जारी नरसंहार की खबरों के बीच आई, जब भारत की विदेश नीति और मानवीय जिम्मेदारी पर चर्चा तेज़ी से बढ़ रही थी। सोनिया गांधी का यह बयान कई प्रमुख समाचार एजेंसियों में प्रकाशित हुआ और भाजपा के जवाबदेहियों को भी घेराव में डाल दिया। सोनिया गांधी ने अपने वक्तव्य में बताया कि गाज़ा में नागरिकों के जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाले गोलाबारी और एरियल बॉम्बिंग को नज़रअंदाज़ करना भारत के बाहर से आया राष्ट्रवादी युक्तिवाद नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति को सार्थक स्वतंत्रता प्राप्त करनी चाहिए और "न्याय और मानवता" के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए। यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस के भीतर से यह मांग भी है कि भारत को अपने वैश्विक सहयोगियों के साथ मिलकर गाज़ा में मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए, न कि केवल दुविधा में फँसे रहने का चुनाव करना चाहिए। इन बातों के जवाब में वर्तमान में सत्ता में स्थित भाजपा ने कहा कि वह अपने देश के हितों को प्राथमिकता देती है और विदेश नीति में देश की सुरक्षा, आर्थिक और रणनीतिक हितों को सबसे ऊपर रखती है। कई भाजपा नेताओं ने सोनिया गांधी के "वोट बँक" रिटॉर्ट को भी उजागर किया, यह कहते हुए कि यह आलोचना राजनीतिक लाभ के लिए की जा रही है न कि वास्तविक मानवीय चिंताओं के लिए। हालांकि, कई विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद ने भारत की विदेश नीति में पारदर्शिता और संवेदनशीलता की आवश्यकता को उजागर किया है, विशेषतः जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा गाज़ा में जलते हुए नागरिकों के लिए त्वरित कार्रवाई का आह्वान किया जा रहा है। सोनिया गांधी के बयान के बाद कांग्रेस के अन्य उच्च पदस्थ नेताओं ने भी एकजुटता दिखाई। राहुल गांधी ने सामाजिक जिम्मेदारी के साथ अपनी मौन तोड़ते हुए कहा कि "हमारी स्वतंत्र विदेश नीति को पुनः प्राप्त करना होगा" और यह स्पष्ट किया कि भारत को अपने आंतरिक लोकतांत्रिक मूल्यों को बाहरी नीतियों में भी प्रतिबिंबित करना चाहिए। उन्होंने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नैतिक स्पष्टता के साथ बोलने का आग्रह किया, जिससे कि दुनिया को इस छोटे से देश की मानवीय प्रतिबद्धता का भरोसा हो। इन सभी चर्चाओं के बीच, गाज़ा में स्थित लोगों की जीवन स्थिति अधिक बिगड़ती जा रही है, जिससे भारत जैसे बड़े राष्ट्रों के लिए इस मुद्दे पर स्पष्ट और सक्रिय रुख अपनाना आवश्यक हो गया है। निष्कर्षतः, सोनिया गांधी की कठोर आलोचना और कांग्रेस की एंटी-गाज़ा मौन की मांग ने भारत की विदेश नीति में एक नया विमर्श सृजित किया है। जबकि सरकार ने राष्ट्रीय हितों की रक्षात्मक नीति को प्राथमिकता दी है, नागरिक समाज और विपक्ष ने मानवतावादी दृष्टिकोण से अधिक सशक्त हस्तक्षेप की मांग की है। यह बहस केवल राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण के पुनर्मूल्यांकन को भी दर्शाती है, जिसमें भारत को विश्व की निगरानी में अपने मानवीय मूल्यों और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है।