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Breaking News: विधानसभा में सीएम विजय की कथा सुनवाई पर उधयनिधि का तीखा विरोध – घर बना सिनेमा
🕒 1 hour ago

विधानसभा के मंच पर द्वीपक्षीय विवाद फिर से हवा में भर गया जब मुख्यमंत्री विजय ने एक छोटा सा किस्सा सुनाते हुए राज्य के शैक्षिक नीति पर सवाल उठाए। उनके इस सरल लेकिन लाक्षणिक प्रस्तुतिकरण को सुनते ही विपक्षी नेता उधयनिधि ने क्षण भर में ही अपने बोल और इशारों से इस समारोह को ‘सिनेमाघर’ घोषित कर दिया। उन्होंने कहा कि विधानसभा अब जनता के मुद्दों पर चर्चा करने की जगह फिल्मों की पटकथा जैसा मंच बन गया है, जहाँ सरकार के हर शब्द को नाटकीय ताने-बाने में बदल दिया जाता है। मुख्य मुद्दा वह था जब सीएम ने राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं—जैसे नेशनल एलिजिबिलिटी एग्ज़ाम (NEET)—के प्रति असंतोष जताया और कहा कि इन परीक्षाओं द्वारा तमिलनाडु के छात्रों पर अनुचित बोझ डाला जा रहा है। उन्होंने इस पर एक छोटी कहानी सुनाकर बताया कि कैसे एक किसान अपने खेत में बीज बोता है, पर सरकारी नियमों के कारण फसल नहीं हो पाती। इस कथा के माध्यम से उनका तर्क यह था कि विद्यार्थियों को भी समान कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। उधयनिधि ने तुरंत इस कथा को टकराव का आह्वान बनाया और विधानसभा को ‘घर’ कहा कि जिसे ‘सिनेमाघर’ में बदल दिया गया है। उन्होंने सत्र को रोकते हुए कहा, "अगर हमारी सभाएँ घर का माहौल नहीं रख पातीं तो फिर इसका क्या फायदा?" उनका यह टिप्पणी निरंतर मीडिया में छा गई और कई समाचार स्रोतों ने इसे त्वरित प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि सरकार के इस तरह के बयान बदलाव की बजाय मात्र प्रदर्शन दिखा रहे हैं, जिससे असली समस्या—छात्रों पर बढ़ता दबाव—भूल जाता है। विपक्षी पार्टियों ने इस पर और अधिक तीखी आलोचना की, विशेषकर द्रविड़ मुनेत्र कड़ंबर कड़ंबर (DMK) के नेता ने सीएम के हाथ के इशारे को ‘वायरल’ बताकर उसकी निंदा की। उन्होंने कहा कि इस इशारे से जनता के सामने सरकार का निराशा और अवहेलना स्पष्ट हो रहा है। जबकि सरकार ने कहा कि यह इशारा केवल एक स्पष्ट संकेत है कि वे शिक्षा सुधार की दिशा में ठोस कदम उठा रहे हैं। इस बीच, विधानसभा में कई अन्य मुद्दे भी उठे, जैसे कि सरकारी नीतियों का सामाजिक स्तर पर असर और किसी भी सार्वजनिक नीति की निष्पादन प्रक्रिया। निष्कर्षतः, इस सत्र में सीएम विजय और उधयनिधि के बीच की तीखी बातचीत ने यह स्पष्ट कर दिया कि तमिलनाडु की राजनीति में शिक्षा, नीति और जनता की आशाएँ कितनी संवेदनशील हैं। विधानसभा का मंच अब भी कई बार नाटकीय रूप में बदल जाता है, फिर भी यह मंच जनता के हितों को लेकर गहन चर्चा का स्थान बना रहना चाहिए। क्या यह संघर्ष आगे चलकर वास्तविक सुधार लाएगा, या फिर यह केवल शब्दों का खेल रहेगा, यह देखना बाकी है।

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✍️ By Pradeep Yadav | 24 Jun 2026