जॉर्ज कुरियन, जिन्होंने हाल ही में केंद्र सरकार में मंत्री पद संभाला था, ने अपना पद त्याग दिया है और केरल की राज्य राजनीति में वापसी की तैयारी में लग गए हैं। यह समाचार विभिन्न प्रमुख समाचार स्रोतों ने पुष्टि किया है। उनका त्यागपत्र राष्ट्रपति के पास पहुँच गया और राष्ट्रपति ने तुरंत इसे स्वीकार किया। कुरियन का यह चुनावी कारनामा तब आया जब भाजपा ने उन्हें राजसभा के पद के लिए दोबारा नामांकित नहीं किया, जिससे उन्हें संदेह हुआ कि वे अब राष्ट्रीय मंच पर अपना स्थान नहीं बना पाएंगे। केरल की राजनीति में उनकी वापसी का इशारा उन्होंने स्वयं भी स्पष्ट किया। एक साक्षात्कार में जॉर्ज कुरियन ने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी के कारण ही मुझे केंद्रीय मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया, लेकिन अब समय आ गया है कि मैं अपने गृह राज्य के लोगों की सेवा फिर से करूं।" उनका यह बयान केरल के जनता में गूँज रहा है, जहाँ कई लोग उन्हें एक भरोसेमंद नेता के रूप में देखते हैं। केरल में कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर उनकी वापसी को लेकर विभिन्न दलों में चर्चा भड़क रही है, जबकि भाजपा इस घटना को अपनी पार्टी के भीतर रणनीतिक निर्णय के रूप में पेश कर रही है। पदत्याग के कारणों को देखे तो मुख्य कारण राजसभा के पद के लिए पुन: नामांकन न मिलना था। कई विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन को देखकर ही इस निर्णय को लागू किया गया। जॉर्ज कुरियन अपने प्रभावी कामकाज, सामाजिक कार्यों और केरल में दलित व पिछड़े वर्गों के लिए की गई पहलों के कारण लोकप्रिय रहे हैं। अब उनका लक्ष्य केरल के विकास के लिए नई योजनाएँ लाना और राष्ट्रीय स्तर पर बने सीमित अवसरों से ऊपर उठकर स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना है। निष्कर्षतः, जॉर्ज कुरियन का पदत्याग और केरल में फिर से सक्रिय होने का उनका इरादा राजनीति के एक नए मोड़ को दर्शाता है। यह कदम न केवल उनके व्यक्तिगत करियर में परिवर्तन लाएगा बल्कि केरल की राजनीति में भी नई ऊर्जा का संचार करेगा। जनता को यह देखना होगा कि वे अपने नए भूमिका में कितनी सफलता प्राप्त करते हैं और क्या उनके नेतृत्व में केरल के विकास की दिशा में नई दिशा निर्धारित हो पाएगी।