उद्धव थाकरे के समर्थकों से घिरे बागी सांसदों ने 2022 में एकत्र हुए शिंदे के विद्रोह को दोहराने की कोशिश में कई बाधाओं का सामना किया है। 2022 में शिंदे ने शिवसेना (युबीटी) के बड़े हिस्से को पार्टी में शामिल कर, केंद्र में भाजपा-नीतियों के विरोध में एक नई दिशा अपनाई थी। उस समय के बाद से इस दल के भीतर विभाजन गहरी हो गई, जिससे निरंतर अस्थिरता का माहौल बना रहा। अब जबकि उद्धव थाकरे ने भावनात्मक तौर पर पदत्याग का प्रस्ताव रखा है और शिंदे नई दिग्गजों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, बागी सांसदों को अपने हटकर कार्यों को फिर से दोहराने में कई राजनीतिक और संवैधानिक जटिलताएँ खड़ी हो गई हैं। पहली अड़चन यह है कि शिंदे के नेतृत्व में बदलते बँटवारे ने पहले से ही कुछ प्रमुख विधायक और सांसदों को अपने पक्ष में कर लिया है। इस प्रक्रिया में शिवसेना (युबीटी) के कई प्रमुख चेयरपर्सन और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले कार्यकारियों को शिंदे के साथ गठबंधन करने के लिए राजी किया गया, जिससे बागी सांसदों की संख्या वास्तव में घटती जा रही है। साथ ही, शिंदे ने अपनी नई गठबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाए हैं, जिससे बहुजन वर्ग के मतदाता वर्ग में भी उसका असर बढ़ रहा है। दूसरी बड़ी बाधा है पार्टी के भीतर अनुशासन के प्रश्न। उद्धव थाकरे के अनुयायियों ने सख्त अनुशासन और विश्वास के साथ शिंदे के विद्रोह को समर्थन दिया था, परन्तु अब बड़े सांसदों के बाद हटकर चलने से पार्टी की पहचान ही कमजोर हो रही है। कई सांसदों ने खुद को अलग पार्टी के साथ मिलाने की बात रखी है, जिससे पार्टी के मूल सिद्धांत और नीतियों में फटावट आई है। इस कारण, वैधता के मुद्दे पर कुछ सांसदों के खिलाफ पार्टी के भीतर ही अनुशासनात्मक कार्रवाई को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे बागी पक्ष को और खुद को सुदृढ़ करने में कठिनाई हो रही है। तीसरी बाधा है-राष्ट्रीय मंच पर सार्वजनिक समर्थन की कमी। शिंदे के विद्रोह के बाद, कई राष्ट्रीय दलों ने इस नई गठबंधन को अपनी नीति में शामिल कर लिया है। भाजपा और राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों ने इस बदलाव को अपने राजनीतिक लाभ के रूप में देखा है, जिससे बागी सांसदों को अपने कदम उठाने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा। साथ ही, मीडिया ने भी इस बदलाव को बड़ी खबरों के रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे बागी स्तंभ की आवाज़ कमज़ोर हो रही है। इन सभी चुनौतियों के बावजूद, बागी सांसद अभी भी अपनी आवाज़ उठाने और उद्धव थाकरे के विचारों को पुनः स्थापित करने की कोशिश में लगे हुए हैं। लेकिन प्रतिद्वंद्वी दल के रणनीतिक कदमों, अनुशासनात्मक मुद्दों, और राष्ट्रीय समर्थन की कमी ने उनके इस प्रयास को कठिन बना दिया है। अंततः यह कहा जा सकता है कि उद्धव थाकरे के बागी सांसदों को शिंदे के 2022 के विद्रोह को दोहराने के लिए गहरी पार्टीिक रचनाओं, कूटनीतिक चतुराई और व्यापक सार्वजनिक समर्थन की जरूरत होगी, अन्यथा उनका लक्ष्य बड़े ही कठिनाई से ही साकार हो पाएगा।