प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैश्विक दक्षिण के हितों को प्रमुखता से रखने का स्पष्ट संदेश दिया है। जी‑7 शिखर सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए, मोदी ने दोनोँ देशों—फ़्रांस और स्लोवाकिया—की यात्रा को अवसर के रूप में देखा, जहाँ उन्होंने आर्थिक, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग को गहरा करने की योजना बताई। यह यात्रा न केवल द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए महत्व रखती है, बल्कि वैश्विक दक्षिण के विकास, जलवायु परिवर्तन और सजग व्यापार नीतियों के लिये एक आवाज़ उठाने का मंच भी है। फ़्रांस के साथ भारत की रक्षा सहयोगी साझेदारी पहले ही कई उच्च‑स्तरीय समझौतों से सुदृढ़ हुई है। मोर्चे पर नौसैनिक क्षमता, समुद्री सुरक्षा और लड़ाकू विमानों की खरीदारी को लेकर विस्तृत चर्चा हुई, जिससे दोनों राष्ट्रों के बीच सामरिक भरोसे को और पुख्ता किया गया। विशेष रूप से, दो देशों के बीच समुद्री युद्ध क्षमता को बढ़ाने के लिये नई धारणाओं पर मतभेद नहीं हुए, जबकि कंधे से कंधा मिलाकर जलसंचार मार्गों की सुरक्षा पर भी सहमति बनी। यह अनुबंध दोनों देशों के आर्थिक हितों तथा भारतीय समुद्री व्यापार पर सकारात्मक प्रभाव डालने की आशा रखता है। स्लोवाकिया की यात्रा में भी मोदी ने सतत विकास और तकनीकी नवाचार के क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया। दोनों देशों ने औद्योगिक उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा और डिजिटल अवसंरचना के क्षेत्र में संयुक्त पहल करने का निर्णय लिया। स्लोवाकिया की उन्नत प्रौद्योगिकी और भारत के बड़े बाजार को मिलाकर, दोनों पक्ष अपने-अपने आर्थिक विकास को तेज करने की दिशा में तत्पर हैं। यह सहयोग न केवल द्विपक्षीय व्यापार को मनोबल देगा, बल्कि वैश्विक दक्षिण के देशों के लिये एक मॉडल स्थापित करेगा, जहाँ विकसित और विकासशील राष्ट्र एकसाथ आगे बढ़ सकते हैं। जैसे ही मोदी जी‑7 शिखर में ग्लोबल साउथ की आवाज़ उठाने की बात करते हैं, उनका कहना है कि यह मंच केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय स्थिरता और सर्वसम्मति वाले नियमों का है। भारत का यह प्रतिबद्धता विश्व में विकसित देशों और विकासशील देशों के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद करेगी। अंतत: इस यात्रा के बाद भारत ने अपने अंतरराष्ट्रीय स्थितियों को नई ऊँचाइयों पर पहुंचाने की रूपरेखा तैयार की है, जिससे वैश्विक दक्षिण के लाखों लोगों के लिये आशा की किरण जलाई जाएगी।