जाने वाले साल की निशानी आज भी दर्द और सवालों में बँधी हुई है। 2023 में भारतीय राजधानी से इराक के बाग्दाद की ओर जा रहे एयर इंडिया के 15‑मिमी बॉइंग 777‑300आई में अचानक हुई तबाही ने 260 लोगों की जान ले ली, पर एक ही नाम नहीं था जो इस दर्दनाक हादसे से जिंदा बचा। अंबर सिंह, जो अपने छोटे बेटे को लेकर तब तक था, अचानक आई धरती से उठी आवाज़ों के बीच पेलोड कक्ष में फँसा और बच निकल गया। इस एक वर्ष के सफर में वह अपने शारीरिक घावों से ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक जख्मों और अनुत्तरित सवालों से भी जूझ रहा है। गुज़रते समय में चैनलिंग रिपोर्टों के अनुसार, दुर्घटना के कारणों की जांच में अभी तक कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकला है, जबकि भारतीय सरकार ने जांच एजेंसियों को पूरी स्वतंत्रता और पेशेवरता से काम करने का आदेश दिया है। हवाई अड्डे पर मौजूद फील्ड एम्बुलेंस, सीबीएस स्टाफ और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की सहायता से विमान के अवशेषों को जुटाकर विश्लेषण किया जा रहा है। फिर भी, बचे रहे अंबर को उन अज्ञात कारणों के बारे में स्पष्टता नहीं मिली, जो उसके परिवार को हर रात डरावनी सपने दिखाते हैं। मुख्यतः दो मुद्दे सामने आते हैं: पहला, बची हुई सवारी के स्वास्थ्य की देखभाल, विशेषकर अंबर की शारीरिक चोटों की ठीक होने की प्रक्रिया। अस्पताल में कई बार सर्जरी के बाद भी उसे कभी‑कभी सांस लेने में कठिनाई, हड्डियों में दर्द और थकान का सामना करना पड़ता है। दूसरा, मनोवैज्ञानिक उपचार की कमी है; कई बचे लोग अब भी गहरी डिप्रेशन और पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) से ग्रस्त हैं। इस बीच, सरकार ने एक विशेष परामर्श समिति स्थापित की है, लेकिन आवश्यक मनोवैज्ञानिक सहायता और आर्थिक समर्थन की कमी से बचे लोग निराश दिखते हैं। जिन सवालों के जवाब अभी तक नहीं मिले, उनका दायरा भी विस्तृत है। क्या विमान में तकनीकी खामियां थीं, जैसे एरोडायनामिक स्थिरता या इंजन फेल्योर? क्या मौसम की स्थितियों ने दुर्घटना को बढ़ावा दिया? और सबसे जरूरी, क्या इस त्रासदी को दोबारा रोकने के लिए एयरोस्पेस सुरक्षा मानकों में कोई बदलाव लाया जाएगा? इन सवालों के जवाब में विश्वसनीय जांच रिपोर्ट का इंतजार है, परंतु बचे लोगों के लिए समय जैसे भी हो, वह रुकता नहीं। अंत में, अंबर सिंह की कहानी हमें यह सिखाती है कि असली बचे केवल शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूती से आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं। उनका संघर्ष और धैर्य न केवल व्यक्तिगत साहस को दर्शाता है, बल्कि पूरी नयी पीढ़ी को चेतावनी भी देता है कि ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए लगातार जांच और सुधार अनिवार्य है। हमें यह याद रखना चाहिए कि हर एक बचे व्यक्ति के साथ जुड़ी है एक कहानी, एक प्रश्न, और एक आकांक्षा – एक सुरक्षित और शांत भविष्य की।