विदेशी मंत्रियों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हाल के दिनों में भारत के विदेश मंत्री एस. जैसिंगा ने यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका की अलग-अलग नीतियों को लेकर तीखा बयान दिया है। यूरोपीय देशों पर भारतीय रक्षा संपदा पर ऐसे हथियार बेचने का आरोप लगाते हुए, जिनका इस्तेमाल भारत के विरुद्ध किया गया, उन्होंने ऐसा कहा कि "यूरोप अपने हथियार बेचेगा, जबकि भारत को उनके इस्तेमाल का झंझट सहना पड़ेगा"। इस टिप्पणी का संदर्भ यूरोप-संयुक्त राष्ट्र गठबंधन द्वारा रूस‑यूक्रेन संघर्ष में अपनाई गई स्थिति और यूएस की तेल नीति से जुड़ा है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले भारत पर दबाव डाला गया था। एक ही समय में, भारत ने सभी परिस्थितियों के बावजूद 2022 से रूस से तेल खरीदा, क्योंकि वह अपने ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। जैशंकर ने अपने बयान में कहा कि यूरोप द्वारा भारत को बेचें हथियारों का उपयोग तब भी था जब भारत ने सीमित जवाबी कार्यवाही की। उनका मानना है कि यूरोप के इस दोहरा रुख से अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने पुर्तगाल, इटली और फ्रांस को विशेष रूप से उल्लेख किया, जिन्होंने हाल ही में भारत को विभिन्न एंटी‑टैंक ग्रेनेड और रडार सिस्टम प्रदान किए। इन हथियारों का उपयोग कुछ समय पहले भारत के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में किया गया, जिससे सुरक्षा चुनौती और बढ़ गई। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या यूरोपीय देशों के अपने हितों में ऐसे निर्यात नीतियों को बदला जा सकता है। दूसरी ओर, जैशंकर ने अमेरिका की नीतियों की भी खुली-खुली आलोचना की। उन्होंने कहा कि "अमेरिका ने हमें रूसी तेल खरीदने से रोकने की कोशिश की, टैरिफ लगा कर दबाव बनाया, फिर वही टैरिफ हटाया"। इस बयान में वे दर्शाते हैं कि अमेरिकी निर्णयों में स्थिरता की कमी है और यह भारत के स्वतंत्र निर्णय को बाधित कर रहा है। यह स्पष्ट था कि भारत ने अपने ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए, और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए, रूसी तेल को एक वैकल्पिक स्रोत माना। इस कदम में उन्होंने राजनीतिक दबाव के बजाय आर्थिक तर्क को प्राथमिकता दी। इन दोनों मोर्चों पर भारत की स्थिति एक स्पष्ट संदेश देती है: वह अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर दृढ़ रहना चाहता है, चाहे वह रक्षा सामग्री की खरीद हो या ऊर्जा सुरक्षा। जैशंकर ने विशेष रूप से कहा कि "भारत ने यूरोप को कई बार सहयोग दिया है, परन्तु जब यूरोप के हथियार भारत के विरुद्ध उपयोग होते हैं, तो हमें आवाज उठानी पड़ती है"। इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि "भारतीय हथियार कभी यूरोप को नुकसान नहीं पहुंचा" और यह बात यूरोप के दोहरा मानकों को उजागर करती है। समापन में कहा जा सकता है कि भारत और यूरोप के बीच यह नई तनावपूर्ण स्थिति अंतरराष्ट्रीय राजनयिक समीकरणों में नई समझौते की जरूरत को दर्शाती है। भारत, जो अपने रणनीतिक स्वायत्तता को महत्व देता है, वह विदेशी नीतियों के दोहरे मानकों से निराश है और भविष्य में ऐसे मामलों में अपनी स्थिति को अधिक सुदृढ़ बनाएगा। इस प्रवृत्ति के साथ, वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा और व्यापार के जटिल परिदृश्य में भारत को अपने शारीरिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए संतुलित और प्रभावी निर्णय लेना होगा।