भारत में इस साल का मानसून पहले ही कई साक्षी पदार्थ लेकर आ चुका है, पर अब नई हलचल का कारण एली नीनो नामक समुद्री जलवायु परिवर्तन है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (एसएनओ) और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों ने पुष्टि की है कि एली नीनो की तीव्रता लगातार बढ़ रही है और यह समुद्र के तापमान को असामान्य रूप से ऊँचा कर रहा है। इस कारण गुजरात, गोवा और आसपास के तटीय क्षेत्रों में बरसात की मात्रा में असामान्य गिरावट आने की संभावना है, जिससे जल संकट और भी गहरी अवस्था में पहुँच सकता है। एली नीनो की विशेषता यह है कि प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग में पानी का तापमान सामान्य से कई डिग्री अधिक हो जाता है। इस दौरान पश्चिमी भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में वायुमंडलीय प्रवाह बदल जाता है, जिससे मौसमी आँधियों की संख्या घटती है और वर्षा के वितरण में भारी असमानता आती है। गुजरात में पहले से ही जलभाड़, नहरों की सूखापन और तालाबों की कमी आज कई सालों से चल रही है; एली नीनो इस स्थिति को और बिगाड़ देगा। गोवा के पर्यटन क्षेत्रों में भी समुद्र के ऊपर बादलों की घटती मात्रा के कारण बरसात कम होगी, जिससे जलस्रोतों पर दबाव बढ़ेगा। वर्तमान में वैज्ञानिकों ने बताया है कि इस एली नीनो चरण में भारत के पश्चिमी तट पर वर्षा में 20 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। इससे न केवल खेती पर असर पड़ेगा, बल्कि जलशक्ति वाले जलाशयों में जल स्तर घटेगा। कई बड़े जलधाराओं के तालाबों में पहले से ही जलस्तर न्यूनतम स्तर पर है, और इस कमी के कारण पीने के पानी की कमी, कृषि में जल की समस्या और उद्योगों की उत्पादन क्षमता पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा। जल संकट को कम करने के लिए तत्काल बरसाती जल सहेजने, जल पुनर्चक्रण और जल संरक्षण की नीतियों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। सरकार ने पहले भी जल सुरक्षा के लिए जल संरक्षण योजना शुरू की थी, पर एली नीनो की तेज़ी से बढ़ती शक्ति के कारण ये कदम अपूरणीय लग सकते हैं। जिले-वार जल स्त्रोतों की स्थिति की जाँच, फसल जल प्रबंधन और जल संरक्षण के लिए ग्रामीण स्तर पर जागरूकता अभियान चलाना अति आवश्यक हो गया है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजनाएं जैसे नदियों का पुनरुद्धार, जलभरे खेतों की अवधारणा और शहरी क्षेत्रों में जल पुन: उपयोग प्रणाली को लागू करना भी अनिवार्य है। अंत में यह कहा जा सकता है कि एली नीनो के कारण उत्पन्न होने वाली जल संकट को सिर्फ एक मौसमी समस्या नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। जल का उचित प्रबंधन, संरक्षण और पुन: उपयोग ही इस प्राकृतिक आपदा के प्रभावों को न्यूनतम करने का एकमात्र उपाय है। यदि स्थानीय प्रशासन और जनता मिलकर ठोस कदम उठाते हैं, तो गुजरात-गोवा क्षेत्र में बरसात की कमी के प्रभाव को सीमित किया जा सकता है और जल संकट की कठोरता को रोका जा सकता है।