प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हालिया राष्ट्रीय सभा में अपने विपक्षी दल के आर्थिक रिकॉर्ड को पुनः समालोचना किया, जहाँ उन्होंने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि "हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ" जैसा कोई आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के शासनकाल में लागू नीतियों के कारण विकास की गति धीमी रही। यह टिप्पणी मोदी के वीपीआर उपस्थिति में दर्ज हुई, जहाँ उन्होंने सीधे कांग्रेस के शासनकाल को लक्ष्य बनाते हुए कहा कि 1991 के बाद से भारत की अर्थव्यवस्था में निरंतर तेज़ी देखी गई है, जबकि 1991 से पहले की प्रतिशत वृद्धि का श्रेय कांग्रेस को नहीं दिया जा सकता। उन्होंने दावा किया कि 1991 से अब तक के 30 वर्षों में जीडीपी की वार्षिक वृद्धि 6-7 प्रतिशत के औसत स्तर पर बनी रही, जबकि कांग्रेस के शासनकाल में अक्सर 5 प्रतिशत से कम की गति दर्ज हुई। इस बयान से विपक्षी दलों में गहरी असहमति पाई गई और संसद में कई सरलीकृत प्रश्न उठे। मोदी ने कहा कि "हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ" का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और यह एक राजनीतिक छल है, जिसे सामाजिक मतभेदों को भड़का कर वोट बैंक राजनीति में प्रयोग किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण, और विदेशी निवेश को सीमित करके देश के विकास को बाधित किया। इन बातों को पुष्ट करने के लिए उन्होंने 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद के आंकड़े प्रस्तुत किए, जिसमें विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में तिगुना वृद्धि, निर्यात में दो‑तीन गुना बढ़ोतरी और किसानों की आय में उल्लेखनीय सुधार दिखाया गया। विपक्षी नेताओं ने मोदी के इस बयान को "इतिहास का विकृत चित्रण" और "विरोधी दल की बदनामी" कहा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ऋषि सिंह ने तर्क किया कि 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में आर्थिक संकट और बँकिंग सॉल्वेंसी परीक्षा के कारण ही विकास दर में गिरावट आई, न कि कांग्रेस की नीतियों के कारण। उन्होंने यह भी कहा कि कई सामाजिक क्षेत्रों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचा, में कांग्रेस के शासनकाल में कई महत्वपूर्ण योजनाएँ शुरू की गईं, जो आज भी लाभकारी सिद्ध हो रही हैं। इस विवाद के बीच, मोदी ने एक बार फिर 140 करोड़ भारतीयों के विकास के अपने लक्ष्यों को दोहराया और कहा कि "हमें यह सुनिश्चित करना है कि हर भारतीय को आर्थिक विकास का फल मिले"। उन्होंने राष्ट्रीय ऊर्जा योजना, विशेषकर परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की दिशा में किए जा रहे कदमों को भी उजागर किया, जिससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सके। इन सबके बीच, विपक्षी दलों द्वारा इस मुद्दे को उठाने की मांग की गई है कि सभी आँकड़ों को पारदर्शी रूप से सार्वजनिक किया जाये और ऐतिहासिक डेटा की तुलना निष्पक्ष ढंग से की जाये। निष्कर्षतः, मोदी के इस तीखे आर्थिक हमला ने भारतीय राजनीति में विकास के आँकड़ों को लेकर फिर से बहस को जन्म दिया है। "हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ" की अवधारणा को खारिज करके उन्होंने कांग्रेस के शासनकाल को निचला दिखाने की कोशिश की, जबकि विपक्षी दल इस बात पर जोर दे रहे हैं कि आर्थिक वृद्धि के कई पहलू हैं, जिनका आकलन बुनियादी आंकड़ों से परे जाकर सामाजिक-आर्थिक प्रभावों की भी जाँच करनी चाहिए। आगे यह देखना बाकी है कि यह मंचीय बहस वास्तविक नीति निर्माताओं तक पहुँच कर भारत के भविष्य के विकास मार्ग को कैसे प्रभावित करेगी।