बारां जिले में किसानों की खाद से जुड़ी गंभीर समस्याओं के समाधान की मांग को लेकर भगत सिंह सेवा प्रमुख नरेश मीणा का आमरण अनशन सातवें दिन भी पूरी दृढ़ता के साथ जारी है। श्री मीणा अपने पैतृक गांव कवाई में अनशन पर बैठे हुए हैं और क्षेत्र के कृषकों के सामने आ रहे खाद के भारी संकट को दूर करने की मांग कर रहे हैं। इस अनशन का मुख्य उद्देश्य खाद की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना, कालाबाजारी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना और किसानों की अन्य समस्याओं का स्थायी समाधान प्राप्त करना है।
इस वर्तमान आंदोलन की पृष्ठभूमि हाल ही में आयोजित किए गए जयपुर कूच से जुड़ी हुई है। जयपुर की ओर बढ़ते समय शिवदासपुरा टोल पर प्रशासनिक अधिकारियों के साथ हुई वार्ता के दौरान चार दिन के भीतर समस्याओं का समाधान करने का आश्वासन दिया गया था, जिसके पश्चात श्री मीणा वापस बारां लौटे थे। हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर तय समयसीमा में ठोस परिणाम सामने न आने के कारण किसानों की नाराजगी और बढ़ गई, जिसके फलस्वरूप यह अनशन निरंतर जारी है।
अनशन के सातवें दिन तक पहुंचने पर श्री मीणा के स्वास्थ्य पर इसका अत्यंत गंभीर प्रभाव पड़ा है। बुधवार को एक विशेष मेडिकल टीम ने उनके स्वास्थ्य की विस्तृत जांच की, जिसमें उनके शारीरिक स्वास्थ्य में भारी गिरावट दर्ज की गई। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, अनशन शुरू होने से पहले उनका वजन लगभग 80 किलोग्राम था, जो अब घटकर 72 किलोग्राम रह गया है। महज सात दिनों के भीतर लगभग 8 किलो वजन कम होना उनके बिगड़ते स्वास्थ्य और इस आंदोलन के प्रति उनकी कठोर प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
क्षेत्र के विभिन्न हितधारकों, किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि खाद की कमी और कालाबाजारी के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था गहरी संकट की स्थिति से गुजर रही है। किसानों का कहना है कि समय पर खाद उपलब्ध न होने के कारण उनकी फसल की पैदावार प्रभावित हो रही है, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय स्तर पर व्याप्त इन विसंगतियों ने पूरे इलाके में एक संवेदनशील माहौल पैदा कर दिया है, जिस पर हर वर्ग की पैनी नजर बनी हुई है।
इस आंदोलन का प्रभाव केवल बारां तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर कोटपूतली-बहरोड़ सहित संपूर्ण राजस्थान के कृषि क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना हुआ है। राज्य भर के किसान संगठनों और ग्रामीण समुदायों को खाद और बीज की कालाबाजारी जैसी समस्याओं से अक्सर दो-चार होना पड़ता है। ऐसे में नरेश मीणा का यह अनशन प्रशासनिक तंत्र और कृषि आपूर्ति व्यवस्था में बड़े सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है, जिससे किसानों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
प्रशासनिक स्तर पर इस घटनाक्रम को लेकर हलचल तेज हो गई है और अधिकारियों की गतिविधियों पर जनता की कड़ी नजर टिकी हुई है। जिला प्रशासन और संबंधित विभागों पर अब यह नैतिक एवं प्रशासनिक दायित्व आ गया है कि वे किसानों की मांगों पर त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई करें। कालाबाजारी में संलिप्त तत्वों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और खाद वितरण व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग लगातार जोर पकड़ रही है।
आगामी परिस्थितियों और भविष्य की दिशा का निर्धारण पूरी तरह से प्रशासन के अगले कदमों पर निर्भर करता है। नरेश मीणा अपनी इस मांग पर अडिग हैं कि जब तक किसानों के हितों में ठोस और धरातलीय कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक उनका यह संघर्ष जारी रहेगा। आम जनता और किसान वर्ग अब प्रशासन की ओर से किसी आधिकारिक और संतोषजनक पहल की प्रतीक्षा कर रहा है ताकि इस गंभीर स्थिति का शांतिपूर्ण और न्यायसंगत समाधान निकल सके।