राजस्थान राज्यभर में दीपावली का पावन पर्व नजदीक आते ही केकड़ी के बाजारों में सजावटी सामान और बिजली की रंग-बिरंगी लाइटों की मांग में भारी तेजी दर्ज की जा रही है, जिसका सीधा और प्रतिकूल प्रभाव स्थानीय कुम्हारों के पुश्तैनी कारोबार पर पड़ रहा है।
केकड़ी क्षेत्र के कुम्हार परिवारों के लिए मिट्टी के बर्तन और दीये बनाना केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा एक सांस्कृतिक दायित्व और आजीविका का मुख्य साधन रहा है, जो आज आधुनिकीकरण की आंधी में संघर्ष कर रहा है।
जमीनी हकीकत यह है कि आज के दौर में उपभोक्ता पारंपरिक मिट्टी के दीयों के बजाय आधुनिक और चमकीली इलेक्ट्रिक लाइटों को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे कुम्हारों की आय के स्रोत लगभग ठप होते जा रहे हैं।
पारंपरिक कारीगरों और स्थानीय विक्रेताओं का कहना है कि बाजार में आधुनिक सजावटी लाइटों के प्रभुत्व के कारण मिट्टी के दीयों की बिक्री में भारी गिरावट आई है, जिससे उनकी लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।
राजस्थान के इस क्षेत्र में कुटीर उद्योगों की यह स्थिति स्थानीय आर्थिकी और पारंपरिक हस्तशिल्प के अस्तित्व के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी है, जिससे पूरा कुम्हार समुदाय चिंतित है।
स्थानीय स्तर पर हालांकि स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की चर्चाएं होती हैं, परंतु कारीगरों को इस संकट से उबारने के लिए ठोस प्रशासनिक और वित्तीय सहायता की अत्यंत आवश्यकता है ताकि उनके पुश्तैनी रोजगार को बचाया जा सके।
आने वाले समय में यदि पारंपरिक कुम्हारों को उचित मंच और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला, तो केकड़ी के बाजारों से मिट्टी के दीयों की पारंपरिक चमक पूरी तरह से गायब हो सकती है।