भाजपा ने निकाय चुनावों से पहले सात अतिरिक्त बागियों को निकाला, जिससे कुल निष्कासित नेताओं की संख्या उनचास हो गई। यह निर्णय पार्टी के राज्य कार्यालय ने घोषित किया, जिसमें कहा गया कि चुनावी माहौल में अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है। इसी समय कांग्रेस को अस्सी से अधिक बागियों की शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनके विरुद्ध कोई कार्रवाई चुनाव के परिणाम घोषित होने के बाद की जाएगी।
ऐसे अनुशासनात्मक कदमों की पृष्ठभूमि में दोनों दलों के भीतर लंबे समय से चल रहे फड़फड़ाहट को समझा जा सकता है। इतिहास में भाजपा ने चुनावी दौर में कड़े अनुशासनात्मक उपाय अपनाए हैं, जबकि कांग्रेस को दो हजार के दशक से ही आंतरिक असंतोष का सामना करना पड़ता आया है, अक्सर यह शिकायतों के रूप में प्रकट होता है। वर्तमान में हुए निष्कासन और शिकायतें इस प्रवृत्ति को और स्पष्ट करती हैं।
संख्यात्मक रूप से स्थिति स्पष्ट है। भाजपा के कुल बागियों की संख्या अब उनचास हो गई, जिसमें हाल ही में सात नए बागी शामिल किए गए हैं, जिन्हें पार्टी के आदेशों के उल्लंघन या विरोधी गतिविधियों में संलग्न होने का आरोप है। कांग्रेस की अस्सी से अधिक शिकायतें विभिन्न प्रकार के अनुशासनात्मक उल्लंघनों को दर्शाती हैं, हालांकि विस्तृत कारण अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। दोनों दलों ने बताया कि उनके आंतरिक समिति इन मामलों की जांच पार्टी के नियमों के अनुसार करेंगे।
डिस्पैच में प्रत्यक्ष उद्धरण नहीं हैं, परंतु पार्टी के अधिकारियों ने अपने-अपने बयानों में स्थिति स्पष्ट की है। एक वरिष्ठ भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि "अनुशासन चुनावी सफलता के लिए अनिवार्य है" और यह बताया कि निष्कासन अभियान को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक था। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि "शिकायतों की जांच चुनाव के बाद की जाएगी, ताकि पूर्वाग्रह का कोई संदेह न रहे"। स्थानीय कार्यकर्ता और व्यापारी इस कदम को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर रहे हैं; कुछ इसे दृढ़ नेतृत्व का संकेत मानते हैं, जबकि अन्य का मानना है कि अत्यधिक शुद्धिकरण से जमीनी स्तर पर समर्थन घट सकता है।
कोटपूतली‑बहरौर जिले पर इन कदमों के व्यावहारिक प्रभाव स्पष्ट हैं। यह क्षेत्र कृषि और छोटे उद्योगों पर निर्भर है, जहाँ दोनों दलों को किसानों, दुकानदारों और युवा मतदाताओं का समर्थन जीतना है। भाजपा के स्थानीय नेताओं के हटने से अभियान जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण होगा, जिससे कुछ गांवों में पार्टी की पहुँच प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, कांग्रेस की लंबित शिकायतें कुछ वार्डों में उम्मीदवार चयन को जटिल बना सकती हैं, जिससे स्थानीय कार्यकर्ताओं में अनिश्चितता बढ़ सकती है।
राज्य स्तर पर प्रशासनिक निकायों ने इन अनुशासनात्मक प्रक्रियाओं की निगरानी करने का आश्वासन दिया है, ताकि वे पार्टी के संविधान और चुनावी नियमों के अनुरूप रहें। चुनाव आयोग को इन आंतरिक कार्रवाइयों की सूचना दी गई है, परंतु उसने स्पष्ट किया कि केवल तभी हस्तक्षेप करेगा जब चुनाव की निष्पक्षता पर कोई प्रभाव पड़े। दोनों दलों से अपील की गई है कि वे पारदर्शी तरीके से आंतरिक विवादों को सुलझाएँ और किसी भी प्रकार की ऐसी कार्रवाई से बचें जो मतदाता सूची या मतदान प्रक्रिया को प्रभावित कर सके।
आगे की राह देखते हुए, भाजपा ने निकट भविष्य में अपने स्थानीय निकाय चुनावी उम्मीदवारों की सूची अंतिम रूप देने की योजना बनाई है, जिसमें निकाले गए बागियों की जगह नए उम्मीदवारों को शामिल किया जाएगा। कांग्रेस, चुनाव के बाद, अपनी अनुशासनात्मक समिति को अस्सी से अधिक शिकायतों की समीक्षा के लिए बुलाएगी, और परिणाम संभवतः अगले विधानसभा सत्र से पहले घोषित किए जाएंगे। कोटपूतली‑बहरौर के मतदाता इन आंतरिक पुनर्गठन को ध्यान से देखेंगे, यह देखेंगे कि क्या यह अधिक संगठित अभियान में परिवर्तित होता है या फिर पार्टी के भीतर असंतोष को बढ़ाता है।