भीलवाड़ा के पंचमुखी मोक्ष धाम स्थित मसाणिया भैरवनाथ मंदिर में एक बार फिर दीपावली के पावन अवसर पर एक विशिष्ट और रहस्यमयी परंपरा का जीवंत रूप देखने को मिला। जहां एक ओर संपूर्ण देश में आवासीय क्षेत्रों और बाजारों में दीपोत्सव का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर श्मशान भूमि के भीतर स्थित इस पावन मंदिर में साधकों का एक समर्पित समूह विशेष अनुष्ठान संपन्न करने के लिए एकत्र हुआ था।
इस रात्रि कालीन अनुष्ठान का मुख्य केंद्र कपाल पूजा और खप्पर साधना की वह अनूठी परंपरा है, जो श्मशान के एकांत और शांत वातावरण में पूरी निष्ठा के साथ निभाई जाती है। समय के साथ इन गूढ़ साधनाओं ने इस क्षेत्र में अपनी एक विशेष पहचान बना ली है, जिसमें भाग लेने वाले साधक बिना किसी प्रचार की इच्छा के अपनी आध्यात्मिक मान्यताओं का पूरी दृढ़ता के साथ निर्वहन करते हैं।
मंदिर के पुजारी रवि खटीक द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, श्मशान भूमि के इस परिसर में पिछले 20 सालों से लगातार इस परंपरा को पूरी नियमबद्धता के साथ निभाया जा रहा है। इस अनुष्ठान की यह लंबी निरंतरता इस बात का प्रमाण है कि यहां के साधक अपनी प्राचीन परंपराओं और गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति कितने समर्पित हैं, जो वर्ष दर वर्ष इस विशिष्ट अनुष्ठान को जीवित रखे हुए हैं।
इस साधना की शारीरिक कठोरता और धरातलीय वास्तविकताओं पर प्रकाश डालते हुए पुजारी रवि खटीक ने बताया कि यह अनुष्ठान अत्यधिक मानसिक और शारीरिक सहनशक्ति की मांग करता है। साधना के दौरान भाग लेने वाले साधक अपने सिर, पीठ तथा सीने पर जलता हुआ खप्पर रखकर रात के सन्नाटे में गंभीर साधना में लीन रहते हैं, जो कि सामान्य व्यक्ति के लिए बेहद कठिन कार्य है।
इन कठिन शारीरिक क्रियाओं के पीछे का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत प्राप्ति या भौतिक लाभ से कोसों दूर है। अनुष्ठान का एकमात्र और सर्वोपरि लक्ष्य संपूर्ण मानवता के सर्वकल्याण तथा विश्व में शांति की स्थापना के लिए ईश्वर से प्रार्थना करना होता है, जिसे साधक अपनी तपस्या के माध्यम से अर्पित करते हैं।
इन बीस वर्षों की लंबी अवधि में इस वार्षिक आयोजन ने उन लोगों के बीच एक विशेष स्थान बना लिया है जो भारतीय संस्कृति के गूढ़ और रहस्यमयी पक्षों में गहरी रुचि रखते हैं। स्थानीय निवासी और श्रद्धालु इस अनूठी परंपरा को भीलवाड़ा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं, जो समाज में सकारात्मक ऊर्जा के संचार का माध्यम बनती है।
श्मशान के शांत और गंभीर परिवेश में मध्य रात्रि तक चले इस अनुष्ठान के सफलतापूर्वक संपन्न होने के साथ ही इस वर्ष की साधना का यह चरण पूर्ण हुआ। आगामी वर्षों के दृष्टिकोण को देखते हुए पुजारी रवि खटीक और अन्य साधकों का यह समूह भविष्य में भी इसी प्रकार पूरी निष्ठा और पारंपरिक मर्यादा के साथ इस प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए संकल्पित है।