बाड़मेर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भूमि पर रामलीला का मंचन एक ऐसी अनूठी परंपरा का निर्वहन कर रहा है, जो आधुनिक व्यावसायिकता के इस दौर में भी अपनी मौलिकता और पवित्रता को पूरी निष्ठा के साथ संजोए हुए है। यहाँ की रामलीला केवल एक सामान्य नाट्य मंचन मात्र नहीं है, बल्कि यह अटूट आस्था, समर्पण और निस्वार्थ सेवा का एक ऐसा जीवंत उदाहरण है जो देखने वालों के मन में गहरी छाप छोड़ जाता है। इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया है कि कला और भक्ति का संगम जब पैसों के लेन-देन से ऊपर उठ जाता है, तो उसका प्रभाव समाज पर कितना व्यापक और चिरस्थायी होता है।
इस ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत वर्ष 1979 में हुई थी, जिसके बाद से यह अनवरत रूप से बाड़मेर की सांस्कृतिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा बनी हुई है। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष प्रदीप कुमार जोशी के कुशल मार्गदर्शन और प्रेरणादायक नेतृत्व में इस आयोजन ने दशकों का सफर तय किया है। उनके निरंतर प्रयासों और दूरदर्शिता के कारण ही यह आयोजन समय के साथ और अधिक परिपक्व हुआ है तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम साबित हुआ है।
जमीनी हकीकत और आंकड़ों पर नजर डालें तो इस भव्य आयोजन की रूपरेखा बेहद अनुशासन और आपसी सहयोग के बल पर तैयार होती है। बाड़मेर में आयोजित होने वाली इस रामलीला में विभिन्न महत्वपूर्ण भूमिकाओं को निभाने के लिए करीब 100 स्थानीय कलाकार पूरी तल्लीनता से आगे आते हैं। ये सभी कलाकार अपने निजी जीवन, कामकाज और व्यावसायिक व्यस्तताओं के बीच से बहुमूल्य समय निकालकर रिहर्सल और मंचन में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करते हैं, जो उनके अनुशासन और समर्पण को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
इस आयोजन का सबसे उल्लेखनीय और प्रेरणादायक पहलू यह है कि इसमें भाग लेने वाला कोई भी कलाकार किसी भी प्रकार का मानदेय या पारिश्रमिक स्वीकार नहीं करता है। चाहे मंच पर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण के रूप में मर्यादा का संदेश देने वाले पात्र हों, अथवा अहंकारी और शक्तिशाली रावण का जटिल किरदार निभाने वाले कलाकार, किसी को भी वित्तीय भुगतान नहीं किया जाता है। सभी कलाकारों का यह दृढ़ विश्वास है कि प्रभु श्रीराम की सेवा करने का यह सुअवसर उनके लिए सांसारिक धन-दौलत से कहीं अधिक मूल्यवान और उनका सबसे बड़ा सौभाग्य है।
बाड़मेर क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने पर इस रामलीला का बेहद सकारात्मक और गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। जब ये करीब 100 कलाकार मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, तो पूरा शहर भक्तिमय माहौल में रंग जाता है और विभिन्न वर्गों के लोग आपसी भेदभाव भुलाकर एकजुट होते हैं। यह आयोजन न केवल सनातन संस्कृति के उच्च आदर्शों को जीवंत करता है, बल्कि युवा पीढ़ी को अनुशासन, नैतिकता और सामूहिक सहयोग का पाठ भी पढ़ाता है।
प्रदीप कुमार जोशी के नेतृत्व में रामलीला कमेटी तमाम चुनौतियों के बावजूद इस परंपरा को पूरी भव्यता के साथ जीवित रखे हुए है। बिना किसी बड़े कमर्शियल बजट या सरकारी अनुदान के, केवल स्थानीय नागरिकों के जनसहयोग और कलाकारों के व्यक्तिगत त्याग के बल पर यह आयोजन हर वर्ष सफलतापूर्वक संपन्न होता है। समिति के सभी सदस्य मंच की साज-सज्जा, संवाद अदायगी और अनुशासन बनाए रखने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करते हैं।
आगामी समय और भविष्य की योजनाओं को लेकर बाड़मेर के कलाकारों और रामलीला कमेटी का उत्साह पूरी तरह से अडिग है। वे इस महान परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पूरी शुद्धता के साथ हस्तांतरित करने के लिए संकल्पबद्ध हैं। बिना मानदेय और पारिश्रमिक की परवाह किए बिना अपनी कला के माध्यम से धर्म और संस्कृति की अलख जगाने वाले बाड़मेर के ये 100 कलाकार संपूर्ण समाज के लिए प्रेरणा का एक ऐसा स्रोत बन चुके हैं जो हमेशा मार्गदर्शन करता रहेगा।