दस्तूर 2020 के दिलेली दंगों की घातक घटनाओं का अब और कोई उलझन नहीं बची। कर्करडूमा अदालत ने तयिर हुसैन, एक पूर्व आप कांग्रेस काउंसिलर, तथा चार अन्य समान-सम्बंधित आरोपियों को इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या का दोषी ठहराया। इस फैसले से दंगे के पीड़ितों और उनके परिवारों को न्याय का एक पहलू मिला, जबकि न्यायिक प्रक्रिया में लंबी खिंचाव और अनिश्चितता के बाद यह सुनवाई अंतिम रूप लेती है। अदालत ने सबूतों की बारीकी से जाँच करने के बाद पाया कि तयिर हुसैन और उनके सहयोगियों ने 2020 के फ़रवरी में हुए दंगे के दौरान हिंसक तंत्र का प्रयोग कर अंकित शर्मा को मार-पीट करके मार डाला। अभियोजन ने 51 बार चाकू घोंपने के साक्ष्य, रक्त के नमूने, गवाहियों और पुलिस रिपोर्टों को प्रस्तुत किया। इस बीच, प्रतिवादी पक्ष ने कई बार दलीलें दीं लेकिन सभी को अस्वीकार कर दिया गया। निर्णायक साक्ष्य में एक ड्रेनेज पाइप से मिलाई गई शव का ठोस प्रमाण भी शामिल था, जिससे हत्याकांड की सच्चाई स्पष्ट हुई। करकरीछा कोर्ट ने तयिर हुसैन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई तथा अन्य चार आरोपी को सात साल से लेकर बारह साल तक की कठोर जेल की सजा दी। इसके साथ ही, प्रत्येक आरोपी को जुर्माने की भी सख्त व्यवस्था की गई है। न्यायालय ने यह भी कहा कि दंगे के दौरान मौलिक मानवाधिकारों की उलंघना और राज्य की सुरक्षा सेवा के कर्मचारियों पर हमला सभी के लिए अभिशापजनक था, और ऐसे कृत्यों को कभी भी बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। यह फैसला न केवल दंगे के बयानों में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा कर्मियों की सुरक्षा के प्रति सरकार की दृढ़ प्रतिकल्पना को भी दर्शाता है। भविष्य में यदि किसी भी प्रकार की हिंसा या आतंकवाद के प्रयास होते हैं तो उनका संयोगित दंड आश्वस्त करेगा कि भारत कानून के मार्ग पर अडिग रहेगा। अंततः, इस न्यायिक निर्णय से दंगा पीड़ितों के रिश्तेदारों को थोड़ा सन्तोष मिला है और देश में शांति तथा न्याय की पुनर्स्थापना की दिशा में एक सकारात्मक कदम उठाया गया है।