मुंबई की धूप‑धुंधली सड़कों पर संसद की खबरें अक्सर राजनैतिक फुसफुसाहटों से गूँजती हैं, पर इस बार शावसेना में फिर से बिखराव की लहर बनकर उभरा है। "ऑपरेशन टाइगर" नामक अंदरूनी योजना के माध्यम से जटिल राजनैतिक चालों की साखी लेकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने फिर एक बार इस विचारधारा‑संगठन को दो हिस्सों में बाँट दिया है। यह विभाजन न केवल मराठी राजनैतिक माहौल को थरथराकर रखता है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी गठबंधन की दिशा बदलने की संभावना को उजागर करता है। शुरुआती रिपोर्टों में शिंदे के करीबी सहयोगियों ने बताया कि उन्होंने बनावटी मीटिंगें, घूसखोरी के पहलू और सर्वसम्मति लिलाने के लिये गुप्त पार्टी नोटिस तैयार किए। इसके साथ ही उन कई सांसदों को दुबारा संसद में बहस के दौरान बारीकी से चिह्नित किया गया, जिन्होंने पहले भी अपनी निष्ठा पर सवाल उठाते हुए शावसेना के मूलधारा से दूर हो जाने की अस्थायी प्रवृत्ति दिखाई। शावसेना के भीतर इस बगावत को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिये शिंदे ने पहले से ही पार्टी के दो बड़े दहलीजों को तैयार कर रखा था। विद्रोही सांसदों को ‘ट्रेटर’ की टैगलाइन लगाकर सार्वजनिक रूप से टीका करने की रणनीति अपनाई गई, जिससे जनता के सामने उनका भरोसा घटे और शावसेना के भीतर उनके सामर्थ्य को खंडित किया जा सके। साथ ही, उभयवर्गीय हाउसिंग स्कीम और जलसंधि नीतियों को शीर्ष पर लाकर, उनके समर्थन को कम करने की दिशा में कदम उठाए गये। यह सभी कदम ‘ऑपरेशन टुडवा’ के उपनाम से भी जुड़े हैं, जिसमें राजनैतिक स्थिरता पर प्रभाव डालने के लिये मीडिया, तकनीकी टीम और ए-लेवल काउंटरइंटेलिजेंस को भी शामिल किया गया। इन प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप शावसेना के छह सांसदों को ‘वाई‑प्लस’ सुरक्षा प्रदान की गयी, जिससे उनका झूठा प्रतिरक्षा का आभास मिला। इस कदम को शिंदे के दिमागी योजनाओं के प्रतीक के रूप में देखा गया, जिससे विपक्षी दल ने इसे एक बड़े छल के रूप में उभारा। इस कारण, नागरीक और सामाजिक संगठनों ने आवाज़ उठाई कि लोकतंत्र के इस कगार पर मौजूदा राजनैतिक संरचना को किसी के व्यक्तिगत हित के लिये नहीं तोड़ना चाहिए। फिर भी, शिंदे ने कहा कि यह कदम ‘विकल्पी लोकतांत्रिक साधनों’ की सुरक्षा के लिये आवश्यक था, और यह राष्ट्रीय गठबंधन, यानी एनडीए को सुदृढ़ बनाने के लिये एक प्रमुख कदम है। भविष्य में इस बिखराव के प्रभाव को देखते हुए कई राजनीतिक विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि शिंदे की यह चाल सफल रही, तो राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए के समीपस्थ गठबंधन पुनर्गठित हो सकते हैं। और भी अधिक, शिवसेना के भीतर नई राजनीतिक फॉर्मेशन उभर सकती है, जो महाराष्ट्र की राजनीति को फिर से परिभाषित कर सकती है। इस तरह, ऑपरेशन टाइगर ना केवल एक राज्यीय पार्टी के भीतर संघर्ष को दर्शाता है, बल्कि भारत के बड़े राजनीतिक ढाँचे में भी गहरा बदलाव लाने की दिशा में एक संकेत बन गया है। अंततः, जनता का चुनावी निर्णय ही इस कहानी की अंतिम पंक्ति लिखेगा, फिर चाहे वह शिंदे की रणनीति को समर्थन दे या पार्टी के भीतर सच्ची स्वतंत्रता को पुनर्स्थापित करने की आह्वान को।