राष्ट्रीय संसद के कार्यकाल में दल के भीतर अनुशासन टूटना कभी‑कभी बड़े राजनीतिक झटके का कारण बन जाता है। हाल ही में पश्चिम बंगाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टी ट्रीणामूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसदों के बीच उत्पन्न हुए मतभेदों ने इस बात को फिर से स्पष्ट कर दिया है कि बड़ी संख्या में सदस्य एक साथ गठबंधन बनाने के बावजूद वे संसद के अनुच्छेद १०(३) के तहत डिस्क्वालिफ़िकेशन की प्रक्रिया से बच नहीं सकते। टीएमसी के भीतर दो‑तिहाई या बीस सांसदों का ब्लॉक बनना, जिसे कई बार पार्टी के अंदर ही अचानक गठित किया गया, अब भी सांसदों के लिये एक जोखिम भरा कदम बन चुका है। दूसरी ओर, इस मुद्दे पर विभिन्न समाचार स्रोतों ने यह उजागर किया है कि कई ऐसी परिस्थितियां हैं जिनमें संसद सदस्य के पुनःनिर्वाचन के अधिकार पर सवाल उठाया जा सकता है। सबसे पहला कारण है जब सांसद अपने पार्टी का समर्थन छोड़कर विरोधी दल के साथ तालमेल बिठाते हैं, जैसा कि कुछ टीएमसी सांसदों ने काली फसल चुनाव के बाद किया। दूसरा कारण है जब सांसद पार्टी के आचार संहिता या अनुशासनात्मक नियमों का उल्लंघन करते हैं, जिससे उन्हें पार्टी के भीतर से निकाल दिया जाता है, परंतु वे अभी भी संसद में अपने पद को बनाए रख सकते हैं। यह ही स्थिति अभी टीएमसी में विद्रोही सांसदों के साथ देखी जा रही है, जिनकी संख्या बढ़ने के साथ ही उनके खिलाफ़ डिस्क्वालिफ़िकेशन की संभावना भी बढ़ती जा रही है। केन्द्रीय चुनाव आयोग ने पहले भी इस बात को स्पष्ट किया है कि जब किसी सांसद का दल से बहिष्करण या पार्टी से निकाला जाना आधिकारिक रूप से दर्ज हो जाता है, तो उसे अपने मंडलीय सदस्यता के आधार पर संसद से हटाया जा सकता है। इस संदर्भ में, यदि दो‑तिहाई या बीस सांसदों को अनुशासनहीनता के कारण हटाया जाता है, तो शेष सांसदों पर भी दबाव बना रहेगा कि वे या तो पार्टी के आदेश का पालन करें या फिर अपने-अपने सीटों से इस्तीफा दें। इस प्रक्रिया में यदि कोई सांसद अपने पक्ष में कोई वैध वैकल्पिक दल नहीं जोड़ पाता, तो वह स्वचालित रूप से डिस्क्वालिफ़ाइड माना जाएगा। वर्तमान स्थिति को देखते हुए प्रमुख राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि टीएमसी के भीतर अनुशासनहीनता को रोकने के लिये पार्टी ने पहले ही कई अनुशासनात्मक कदम उठाए हैं, परन्तु यह कदम पर्याप्त साबित नहीं हो पाए। अंतिम चरण में यदि कांग्रेस के कई सांसदों ने अपनी पार्टी से अलगाव की घोषणा की तो उन्हें कानून के तहत सख़्त कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इस प्रकार, चाहे 20 सांसद हों या दो‑तिहाई अधिकांश, यदि वे पार्टी के नियमों का उल्लंघन करते हुए विरोधी दल की ओर रुख करते हैं, तो उनके लिये संसद से हटाए जाने की प्रक्रिया अनिवार्य हो जाएगी। समाप्ति में कहा जा सकता है कि टीएमसी के भीतर चल रहे इस अंदरूनी संघर्ष ने राष्ट्रीय राजनीति में एक नया मोड़ स्थापित किया है। सांसदों की संख्या चाहे अधिक हो या कम, यदि वे पार्टी के अनुशासन का उल्लंघन करते हैं तो उन्हें डिस्क्वालिफ़िकेशन के खतरे से बचना संभव नहीं है। इस कारण भविष्य में पार्टी के नेतृत्व को अपने सदस्यों के साथ अधिक संवाद और अनुशासनात्मक उपायों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता महसूस होगी, ताकि संसद में अपने प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखा जा सके और राजनीतिक अस्थिरता को कम किया जा सके।