देश की राजनैतिक धुंध में फिर एक बार तेज़ी से उठी लहर, जब अभिजीत डिपके ने "हम कब तक डर के साए में जीएंगे?" का सवाल उठाया और इस बात पर बल दिया कि नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है। इसी मंच पर उत्तराखंड के सामाजिक कार्यकर्ता और शैक्षणिक प्रवर्तक सोनम वांगचुक ने भी कोक्रोच जनता पार्टी (CJP) के साथ जुड़कर विरोध प्रदर्शन को नई ऊँचाइयों पर ले गया। यह विरोध जंतर mantar में उत्पन्न हुआ, जहाँ असंतोष की लहरें सरकार की नीतियों और विभिन्न आरक्षण मुद्दों के खिलाफ उभरीं। प्रदर्शन के दौरान अभिजीत डिपके ने अपने भाषण में स्पष्ट कर दिया कि वर्तमान प्रशासन ने लोगों के बीच भय की भावना को जन्म दिया है। उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार द्वारा धर्मेंद्र प्रधान को नहीं हटाया गया, तो CJP का आंदोलन और भी तीव्र हो जाएगा। इस ओर कई समर्थकों ने भी अपने-अपने विचार रखे, कई युवा वर्ग ने बड़े संघर्ष में हिस्सा लेकर एकजुटता का परिचय दिया। इन घटनाओं को 'डर के साए' के रूप में दर्शाया गया, क्योंकि लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने से डरते नहीं रहे। प्रदर्शन के बाद जंतर mantar में छह लोगों को हिरासत में ले लिया गया, जबकि कुछ ने कुचल-करतबों से बचने के लिए भटकते हुए भाग ले लिया। भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी दलों के कुछ प्रतिनिधियों ने इस आंदोलन को बड़े स्तर पर निरंतरता देने की मांग की। इस बीच, The Times of India ने यह भी बताया कि CJP के प्रमुख ने सभी वर्गों के लोगों के बड़े पैमाने पर विभिन्न आयु वर्ग के नागरिकों को इस आंदोलन में भाग लेते देखा। उन्होंने कहा कि बड़े बूमर्स से लेकर Gen Z तक सभी ने 'भय' के खिलाफ एकजुट हुए हैं। अंत में यह कहा जा सकता है कि अभिजीत डिपके और सोनम वांगचुक की इस संघर्ष ने जनता में जागरूकता बढ़ाई है। यह सिर्फ एक व्यक्तिगत विरोध नहीं बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के लिए लोगों की आवाज़ का प्रतीक बन गया है। यदि सरकार इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाएगी तो यह आंदोलन और भी बड़ा रूप ले सकता है, और जनता के डर को भुलाने के लिए कई नई तड़के दिखा सकता है। इस संदर्भ में सभी दलों को चाहिए कि वे नागरिकों के डर को खत्म करने के लिए मिलजुल कर काम करें और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ बनाएं।