बनभाटा, कर्नाटक – राज्य की राजनीति में अचानक गर्मी का सामना करना पड़ा है जब कर्नाटक कांग्रेस के दिग्गज नेता रामलिंग रैड्डी ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया। यह खबर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई, क्योंकि कुछ ही घंटों में उनका इस्तीफा लेकर बिगड़े पोर्टफोलियो बंटवारे को लेकर उठे विवाद का समाधान हुआ। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सूरजवाला ने इस घोषणा पर "बीजेपी में अचंभा" कहा, जबकि मुख्यमंत्री शिवाकुमार ने त्वरित कदम उठाकर इस विवाद को समाप्त करने की घोषणा की। रैड्डी ने मूल रूप से 12 अप्रैल को अपने राजकीय मंत्री पद से इस्तीफा दिया था, जब उन्होंने बताया कि सरकार ने पोर्टफोलियो के बंटवारे में अनुचित व्यवहार किया है। उनका आरोप था कि उनकी जिम्मेदारी में शामिल प्रमुख विभागों को बिना उचित कारण के हटाया गया, जिससे कांग्रेस के भीतर असंतोष की लहर दौड़ गई। इस पर कई कांग्रेस कमेटी सदस्यों ने उनके साथ खड़े होकर सरकार को जवाबदेह बनाने की मांग की। परंतु इस तनावपूर्ण स्थिति के बीच, मुख्यमंत्री शिवाकुमार ने रैड्डी और कांग्रेस वरिष्ठ नेतृत्व के साथ एक तेज़ बैठक की। इस बैठक में दोनों पक्षों ने सहमति जताई कि पोर्टफोलियो वितरण को पुनः समीक्षा किया जाएगा और रैड्डी का इस्तीफा वापस ले लिया जाएगा। बीजेपी के नेता सीटी रवि ने इस स्थिति को "राज्य में अस्थिरता का संकेत" कहा और बताया कि इस प्रकार के पोर्टफोलियो टकराव से राज्य के कार्यकलापों में बाधा आ सकती है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अपने अंतरिम मुद्दों को सुलझाने के लिए अधिक सुदृढ़ता से काम करना चाहिए, ताकि जनता के हित में कोई भी देरी न हो। दूसरी ओर, कांग्रेस के भीतर इस कदम को कई लोग एक रणनीतिक चाल मान रहे हैं, जिससे रैड्डी अपने राजनीतिक प्रभाव को बरकरार रख सकें और आगामी चुनावी रण में कांग्रेस को मजबूत बना सकें। इस विकास के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कर्नाटक में सत्ता समीकरण में नया मोड़ आया है। यदि कांग्रेस अपने भीतर के विवादों को सुलझा लेती है और एकजुट रहती है, तो इसे बीजेपी के प्रबल दबाव का सामना करना आसान होगा। वहीं, बीजेपी को अब अपने विरोधी दल की रणनीति को पुनः देखना पड़ेगा, ताकि वे चुनावी मैदान में जीत की संभावनाओं को न खोएँ। अंततः, रामलिंग रैड्डी की इस वापसी ने कर्नाटक राजनीति में एक नया अध्याय लिखा है, जिसमें सभी दलों को अपने-अपने कदम सावधानीपूर्वक उठाने की जरूरत है।