त्रिणमूल कांग्रेस में आज़ी बुनियादी चर्चा के साथ ही एक नया संघर्ष उभर कर सामने आया है। पश्चिम बंगाल की मुख्य नेता माँटा बनर्जी के अधिकार को कम करने की कोशिश में पार्टी के भीतर से ही दो ध्रुवों के बीच तीव्र टकराव जारी है। विद्रोही इकाई और निष्ठावान पक्ष के बीच इस झगड़े ने राजनैतिक माहौल को और अधिक ध्रुवीकरण कर दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने बताया कि माँटा को "मुख्य सलाहकार" के अतिरिक्त "अध्यक्ष" के रूप में मान्यता देना उचित नहीं है, जबकि उनके कई अनुयायी इस बदलाव को उनके नेतृत्व को घटाने की साज़िश मानते हैं। इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर दो अलग-अलग मीटिंगें आयोजित की गईं, जबकि शेष 32 विद्रोही विधायक केवल एक छोटे से समूह के रूप में भाग ले सके। उनमें से 16 ने माँटा को "अध्यक्ष" के बजाय "मुख्य सलाहकार" के रूप में संबोधित करने की मांग की, जिससे स्पष्ट हुआ कि पार्टी के भीतर सत्ता का पुनः वितरण हो रहा है। दूसरी ओर, राष्ट्रवादी दल के भीतर कुछ सदस्य, जो अब तक माँटा के साथ निष्ठा का प्रदर्शित करते थे, उन्होंने इस बदलाव को "विरोधी भावना" के रूप में उजागर किया। उन्होंने कहा कि यह कदम टिम्सी के एकजुटता को तोड़ने की दिशा में है और इससे पार्टी की छवि को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। कई अनुभवी सांसदों ने भी इस फैसले को "कमजोर और अराजक" बताया, और माँटा को "उपाध्यक्ष" के रूप में रखने के बजाय संघ के भीतर सच्ची लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाने की अपील की। इन घटनाओं के बीच, कई विश्लेषकों ने कहा कि यह बवाल केवल शक्ति संघर्ष नहीं है, बल्कि एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है। यदि इस तरह के भीतरू मतभेद हल नहीं हुए तो त्रिणमूल कांग्रेस की आगामी चुनावी योजना, विशेषकर देशभक्तियों और विकास की प्रतिज्ञा, प्रभावित हो सकती है। विद्रोही नेताओं का कहना है कि वे केवल व्यक्तिगत शक्ति नहीं, बल्कि पार्टी के मूल सिद्धांतों और जनता के हित को याद रखकर ही इस विरोध में शामिल हैं। लेकिन माँटा के समर्थकों का मानना है कि इस प्रकार का विरोध पार्टी को अस्थिर कर सकता है और अंततः मतदाताओं का भरोसा खो सकता है। अंत में, यह कहा जा सकता है कि त्रिणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा यह संघर्ष राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन सकता है। अगर माँटा बनर्जी इस चुनौती को पार कर पाती हैं, तो वह अपने नेतृत्व को और अधिक सुदृढ़ कर सकती हैं और पार्टी को एकजुट कर आगे बढ़ा सकती हैं। परन्तु यदि विद्रोहियों की आवाज़ को अनदेखा किया जाता है, तो यह पार्टी के भीतर अंतहीन विभाजन का कारण बन सकता है, जिससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई शक्ति संरचना स्थापित हो सकती है। यह देखना बाकी है कि कौन सी दिशा में यह संघर्ष विकसित होता है और इसका असर जनता की राय और आगामी चुनावों पर कितना गहरा होगा।