नई दिल्ली – 2024 में वित्त मंत्रालय के एक बिनसत्तर के ढांचे ने स्पष्ट कर दिया कि निकोबार द्वीप पर विकसित होने वाला नया पोर्ट किसी भी रणनीतिक लक्ष्य से रहित है। यह बयान तब आया जब हाल ही में कई प्राविधिक और राजनीतिक चर्चाओं में इस परियोजना को भारत की समुद्री रणनीति का मुख्य स्तंभ माना जा रहा था। सरकार की इस बात पर दलील है कि पोर्ट का निर्माण मुख्यतः आर्थिक और संविदानिक उद्देश्यों के तहत किया गया है, न कि राष्ट्रीय सुरक्षा के किसी विशेष लक्ष्य के तहत। इस कारण से विपक्षी दलों ने इसे रणनीतिक महत्वहीन बताकर सवाल उठाया है और पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया में देरी का आरोप भी लगाया है। वित्त मंत्रालय के विशेषज्ञों ने बताया कि निकोबार पोर्ट का मुख्य उद्देश्य द्वीप पर जलमार्ग व्यापार को सुगम बनाना और स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि इस पोर्ट द्वारा उत्पन्न आर्थिक लाभ अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, परन्तु इसको किसी सैन्य या सुरक्षा उद्देश्य से जोड़ना उचित नहीं है। यह बात तब और स्पष्ट हुई जब कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडियाओं ने इस पोर्ट को चीन के साथ संभावित तनाव के मद्देनज़र एक ‘होरमुज़-सम’ मानचित्र में रखा था, परन्तु भारत के वित्तीय अधिकारी ने इसे निरुपयोगी कहा। विपक्ष की ओर से इस निर्णय पर तीखा प्रहार हुआ। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस परियोजना को "सबसे बड़ा अपराध" दर्ज करते हुए कहा कि सरकार ने पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को अनदेखा करके भारी लागत के साथ एक वाणिज्यिक उद्यम को धुंधले ढंग से प्रस्तुत किया है। उनका दावा है कि इस पोर्ट की औद्योगिक विस्तार से निकोबार के जैविक विविधता और स्थानीय जनता की आजीविका को खतरा हो सकता है। कई पर्यावरण संगठनों ने भी इस परियोजना को लेकर कोर्ट में याचिका दायर की है, जिससे स्पष्ट होता है कि इस परियोजना के आगे बढ़ने में कई बाधाएँ मौजूद हैं। समग्र रूप से कहा जा सकता है कि निकोबार पोर्ट की रणनीतिक दिशा अब स्पष्ट नहीं है। वित्त मंत्रालय ने इसे आर्थिक विकास के साधन के रूप में देखा, जबकि विपक्ष और पर्यावरणीय समूह इसे एक व्यावसायिक खोज के रूप में खारिज कर रहे हैं। इस मुद्दे पर आगे की बहस का मुख्य फोकस यह रहेगा कि क्या इस पोर्ट को केवल आर्थिक लाभों के लिए विकसित किया जाए या इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरणीय संरक्षण और स्थानीय लोगों के हितों को संतुलित करते हुए संचालित किया जाए। यह बहस निकोबार द्वीप के भविष्य को तय करेगी और भारत की समुद्री नीतियों के दिशा-निर्देशों पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।