केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रह्धन को हाल ही में निरंतर परीक्षा स्थगन के कारण जनता और विद्यार्थियों से तीव्र आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। पहले नेति (NEET) की व्यवस्था में देरी, फिर सीबीएसई (CBSE) के बोर्ड परीक्षा में उलझन, और अब केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (CUET) के शेड्यूल में असमान्य बदलाव ने इस मुद्दे को और जटिल बना दिया है। विद्यार्थियों ने आधिकारिक स्रोतों से देरी के कारण अपने करियर की योजना बनाना कठिन समझा, जबकि अभिभावकों ने परीक्षा के समय-सारिणी में अचानक बदलाव को अनैतिक बताया। इस बीच, राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) ने आधिकारिक तौर पर नई तिथियों की घोषणा की, जिससे कुछ क्षेत्रों में आशा की किरन तो दिखी, लेकिन तकनीकी गड़बड़ियों के कारण कई केंद्रों में परीक्षा पुनः स्थगित हो गई। NTA ने जानकारी दी कि CUET-UG 2026 की प्राथमिक तिथि 31 मई, 6 और 7 जून निर्धारित की गई है। परन्तु कई परीक्षा केंद्रों में तकनीकी त्रुटियों के कारण प्रश्नपत्र वितरण में समस्या उत्पन्न हुई, जिससे दोपहर सत्र की समय-सारिणी में परिवर्तन किए गए। इससे प्रभावित छात्रों को अचानक नई समय-सारिणी के अनुसार अपने तैयारी को अनुकूलित करना पड़ा। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों ने बताया कि इन गड़बड़ियों के कारण कुछ केंद्रों में परीक्षा पूरी नहीं हो सकी और पुनः परीक्षा का समय निर्धारित किया गया। यह स्थिति न केवल छात्रों के मनोबल को झंकझोरती है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है। धर्मेंद्र प्रह्धन के खिलाफ विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि लगातार परीक्षा में देरी से विद्यार्थियों का भविष्य अनिश्चित हो रहा है, और यह सरकार की अक्षम्य योजना का प्रमाण है। सरकार ने कहा कि देरी का कारण वैश्विक स्वास्थ्य संकट, तकनीकी चुनौतियाँ और कुछ मामलों में अनपेक्षित घटनाएँ रही हैं, परन्तु यह स्पष्टीकरण सभी के लिए पर्याप्त नहीं माना गया। कई छात्र संघों और अभिभावक संगठनों ने भी एंगेजमेंट की मांग की है, जिससे भविष्य में ऐसी त्रुटियों से बचाव के लिए एक ठोस योजना बनायी जा सके। अंत में यह स्पष्ट है कि शिक्षा क्षेत्र में परीक्षा शेड्यूल का प्रबंधन अत्यंत संवेदनशील कार्य है, जिसमें छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। तकनीकी बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करना, पर्याप्त समय सीमा देना और पारदर्शी संचार सुनिश्चित करना इस दिशा में आवश्यक कदम हैं। यदि इन मुद्दों को गंभीरता से लिया जाता है, तो भविष्य में ऐसी देरी और गड़बड़ियों से बचा जा सकता है, जिससे छात्रों का आत्मविश्वास और शिक्षा प्रणाली पर भरोसा पुनः स्थापित हो सके।