बिल्कुल नई खबर के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान ने हाल ही में 60‑दिन के यायावाद को बढ़ाने के लिए एक समझौता किया है। यह कदम दोनों देशों के बीच चल रहे तनाव को कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है। यूएस की नई प्रशासनिक नीति और ईरान की असंतुष्ट प्रवचनियों के बीच एक समझौते तक पहुँचने की कोशिशें पिछले कुछ हफ़्तों में तेज़ी से चल रही थीं। इस समझौते के तहत, दोनों पक्षों ने मौजूदा यायावाद को दो महीने तक बढ़ाने पर सहमति जताई है, जिससे आगे की वार्ता के लिए समय मिल सके। हालांकि, इस समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मंजूरी अनिवार्य है, जिससे कई विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव की वास्तविकता पर सवाल उठाए हैं। समझौते की विस्तृत शर्तों में कहा गया है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के सैन्य संचालन को रोकेंगे और विशेष रूप से खाड़ी क्षेत्र में किसी भी नई सैन्य कार्रवाई को टालेंगे। इस दौरान, दुबई, कुवैत और ओमान जैसे घिरे हुए देशों का कहा गया है कि वे इस शांति प्रक्रिया में सहयोग करेंगे और किसी भी उल्लंघन की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया देंगे। चीन और रूस ने भी इस समझौते को समर्थन देते हुए कहा कि यह मध्य‑पूर्व में स्थिरता लाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। वहीं, ईरान ने सम्बंधित ख़़ुर्दी में कहा है कि वह इस समझौते के अंतर्गत यूएस द्वारा किए गए पिछले हमलों को भी वापस लेगा, जिसमें इराक में आयरन गार्ड समूह पर किए गए हमले शामिल हैं। इसी बीच, इस समझौते को लेकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखी गई हैं। कुछ देशों ने इसे एक कदम आगे माना, जबकि अन्य ने इसे अस्थायी समझौते के रूप में देखा। विशेषकर यूएस के पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प के समर्थकों ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह के समझौते से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है, जबकि विदेश नीति विशेषज्ञों ने इस समझौते को मध्य‑पूर्व में शांति की नई दिशा के रूप में सराहा। इन सभी तथ्यों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि 60‑दिन की यायावाद बढ़ोतरी अभी भी अधूरी है और इसकी अंतिम मंजूरी पर ही सभी की नजरें टिकी हैं। यदि ट्रम्प इस समझौते को अनमुक्त कर देते हैं, तो यह क्षेत्र में तनाव कम करने और दीर्घकालिक शांति स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा सकता है। लेकिन यदि मंजूरी में देरी या अनिच्छा रहती है, तो इस समयसीमा की समाप्ति के बाद संभावित संघर्ष की संभावना फिर से उभर सकती है। इस प्रकार, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का यह नया मोड़ आगे आने वाली घटनाओं को काफी प्रभावित करेगा।