प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश को गर्मी के बारे में सतर्क करने के लिए एक व्यापक परामर्श जारी किया, जिसमें नागरिकों को पानी की बचत, समय पर थंडे स्थानों का उपयोग और स्वास्थ्य संबंधी उपायों को अपनाने की सलाह दी गई। जबकि इस परामर्श का उद्देश्य लोगों को अत्यधिक तापमान से बचाना था, यह कदम कई विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं द्वारा तीव्र प्रहार का शिकार बन गया। उनका तर्क है कि सरकार ने पहले ही बेतरतीब वनकटाई और औद्योगिक प्लानिंग से देश के प्राकृतिक जलवायु संतुलन को बिगाड़ा है, फिर भी वह गर्मी की लहर को रोकने के लिए आदेश जारी कर रही है। यह विरोधाभास कई सवाल उठाता है: क्या सरकार का यह कदम वास्तव में प्रभावी है, या यह केवल सार्वजनिक भावनाओं को बहलाने का माध्यम है? जब भारत में लगातार बढ़ती तापमान की लहरें और असामान्य मौसम पैटर्न देखे जा रहे हैं, तो विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय निकाय भी भारत की जलवायु नीतियों की गंभीर समीक्षा कर रहे हैं। यूँएन के एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक गर्मी, तेज़ी से बढ़ते आँधियों और असामान्य मानसून की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। इस संदर्भ में, पर्यावरणीय संगठनों ने कहा है कि सरकार की वनवन नीतियों में मौलिक बदलाव न किए जाने से ही ऐसी जलवायु आपदा को रोकना मुश्किल है। विरोधी दलों ने भी इस परामर्श को तीखा निशाना बनाया है। विपक्षी नेता कर्नाटक के कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने इसे 'भारी महंगाई की जलती हुई लपट' से तुलना की, और बताया कि जबकि सरकार जनसाधारण को गर्मी से बचाने की सलाह दे रही है, उसी समय वह आर्थिक नीतियों के माध्यम से जनता को महंगाई से जकड़ रही है। कई विश्लेषकों ने यह भी इंगित किया कि न केवल गर्मी में वृद्धि, बल्कि रातों में तापमान का बढ़ना भी एक गंभीर समस्या बन रहा है, जिससे लोगों की नींद और स्वास्थ्य दोनों पर असर पड़ रहा है। इन सब तथ्यों को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि केवल एक सलाहपत्र से गर्मी की लहर को रोकना असंभव है। इसके लिए दीर्घकालिक योजना की जरूरत है, जिसमें वन संरक्षण, जल स्रोतों का संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा का प्रोत्साहन और सतत कृषि प्रणाली शामिल हों। साथ ही सरकार को अपने आर्थिक नीतियों को पुनः जांचना चाहिए, ताकि जनसंख्या के जीवन स्तर को अस्थायी राहत के बजाय स्थायी सुधारों के माध्यम से बेहतर बनाया जा सके। समाप्ति में कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री की गर्मी परामर्श ने जनता में जागरूकता बढ़ाने का काम जरूर किया है, लेकिन यह तभी सफल होगा जब इसे व्यापक पर्यावरणीय सुधारों और ठोस नीति बदलावों के साथ जोड़ा जाए। तभी भारत अपने नागरिकों को न केवल वर्तमान गर्मी से बचा पाएगा, बल्कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से भी सुरक्षित रख सकेगा।